बॉलीवुड पर अंडरवर्ल्ड का नियंत्रण

बॉलीवुड
दिवंगत अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत

फिल्मी दुनिया एक मॉल के समान है, जहां अभिनेता एवं अभिनेत्री अपनी कला, संगीतकार संगीत, गीतकार गीत इत्यादि बेचते हैं, जिन्हें फिल्म प्रोड्यूसर अपने पसंद के मुताबिक खरीदते हैं एवं स्वतंत्र होकर फिल्में बनाते हैं। भारतीय सभ्यता संस्कृति की मुख्य बिंदु में मनोरंजन भी एक मुख्य अवयव होता था। यह परंपरा लगभग शुरुआत से 1971-72 तक चली।

Black and White के स्थान पर रंगीन फिल्में बननी प्रारंभ हुईं। अधिक बजट बनने लगा। धन की आवश्यकताओं ने अपनी काली कमाई को उजला करने के लिए भ्रष्ट बिल्डर, व्यापारी, नौकरशाह, स्थानीय क्षेत्रीय पार्टियों के राजनेताओं, कुख्यात अपराधियों तथा हाजी मस्तान सरीखे ने अपना योगदान दिया। नजीता यह हुआ कि बड़े-बड़े कलाकार भी इन सेठों की बेटे-बेटियों की शादी में ठुमके लगाने चले जाते थे। साथ ही भ्रष्ट व्यापारियों के नाम पर प्रोडक्ट का प्रचार टीवी पर करते थे।

इसी बीच बैंक के तृतीय श्रेणी का कर्मचारी कुख्यात तस्कर अपराधी दाऊद इब्राहिम पैदा हुआ। उसने इस मॉल को खरीद लिया, जिसके संगठन में बंबई के भ्रष्ट राजनेता, भ्रष्ट पुलिस अधिकारी एवं कुख्यात अपराधी शामिल थे। अब फिल्म के नाम, कलाकार, संगीतकार, गीतकार, अभिनेता एवं अभिनेत्री का चुनाव का काम इसी के हाथ में चला गया।

इसी बीच अंतरराष्ट्रीय मुस्लिम संगठन से दाउद की पहचान बनी। भारत से नफरत करने वालों ने भारतीय फिल्म जगत के मुस्लिम कलाकारों के सफेद चोला का सदउपयोग किया तथा बनने वाली फिल्मों में वैसे कलाकार रखे गए जो चपरासी या तृतीय श्रेणी के लायक भी नहीं थे। पारिवारवाद पृष्ठभूमि के कलाकारों की भीड़ लग गई। अब उर्दू कवि, लेखकों का बहार आया तो हिंदी कवि, लेखक विमुख होकर वहां से विदा ले लिए।

1991 में बंम्बई बम बलास्ट की घटना में 500 मौतें एवं 1000 विकलांग हो गए। दाउद भागकर पाकिस्तान चला गया लेकिन उसका साम्राज्य चलता रहा। हिन्दू देवी-देवताओं के उपहास, हिंदू साधु-संतों की विकृति आदि-आदि की फिल्में बनने लगी। इतना ही नहीं वे लोग जो खुद अपनी माँ बहन एवं बेटी को पर्दे के पीछे रखत थे, वे अर्द्धनग्न फिल्में बनाना शुरु किया। चुंबन लेने पर परहेज नहीं था। ये सब भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के खिलाफ एवं सोची समझी साजिश थी।

उन फिल्मों का प्रभाव यह हुआ कि लाखों अशिक्षित, अर्द्ध शिक्षित बेरोजगार युवक-युवतियों ने लव जिहाद एवं प्रेमालाप में अपने भविष्य को बर्वाद कर लिया। तत्कालीन सरकार को अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि पर ऑंच न आए इसलिए इस कुकर्म पर ध्यान ही नहीं दिया। हद तो तब हो गई कि मशहूर कलाकार अभिताभ बच्चन साहब ने अमर, अकबर एथोनी नामक फिल्म में अकबर के रूप में पहनी पोशाक में अपराधियों की गोली भी कुछ उनका बिगाड़ न सका।

कुछ हिन्दु साधुओं के कुकर्म के प्रदर्शन पर मेरी विपरीत राय नहीं लेकिन वर्तमान परिस्थिति में मुस्लिम आतंकवाद मदरसा एवं गिरिजाघरों में मौलवी एवं पादरियों के द्वारा यौन शोषण, पाकिस्तान, बांग्लादेश एवं अफगानिस्तान में हिन्दुओं पर होने वाले मानवाधिकारों पर आधारित फिल्में क्यों नहीं बनी? कारण स्प्ष्ट है कि दाउद एक मुखौटा है और उसके पीछे कई ऐसे इंटेलेक्चुअल लोग हैं जो फिल्मी दुनियां से जुड़े हैं।

बंबई बंबई धमाका में आमिर खान, नवाजुद्दीन खान एवं उपराष्ट्रपति रहे हामिद अंसाली को भारत असहिष्णु नहीं लगा लेकिन इन सबको भारत तब असहिष्णु लगा जब कुछ हिन्दु सिर-फिरे लड़को ने दादरी में एक गौ-मांस की तस्करी करने वालों की पिटाई कर दी। बाद में उसकी मौत हो गई। जहां अल्पसंख्यक पूर्णरूपेण अपने धार्मिक मान्यताओं का पालन करते हों लेकिन बहुसंख्यक हिंदू सिर्फ हिंदू की सुरक्षा संपन्नता की बात करता हो तो वही मुस्लिम इसे सांप्रदायिकता कहता है।

दुनिया जानती हैं कि विश्व में हिंदू को छोड़कर कोई धर्मनिरपेक्ष नहीं है। फिर भी लुटियन गैंग के द्वारा स्वाभिमानी, देशभक्त हिंदुओं को साम्प्रदायिकता का टीका लगता रहा जैसा कि सरदार पटेल, राजेंद्र प्रसाद वीर सावकर इत्यादि को झेलना पड़ा।

सुशांत सिंह राजपूत की मौत उसी दाउद के विरोध का नतीजा है। सिंडिकेट के मर्जी के खिलाफ कोई अपना कला प्रदर्शन कर नहीं सकता। अगर करता है तो उसका बुरा परिणाम भुगतना पड़ता है। यह पहली घटना नहीं है। इससे पहले सैंकड़ों घटनाएं हैं जिन्हें दवा दिया गया। लेकिन इसका विरोध हुआ। कारण स्पष्ट है कि तत्कालीन सरकार अपने विरासत वाले वोंट बैंक को खिसकने नहीं देना चाहती थी।

वर्तमान सरकार पर लोगों का अटल विश्वास है कि अन्याय पर सरकार सख्त एक्शन लेगी। यही कारण है कि कंगना रनौत जैसे बहादुर लड़की ने जमकर अपने दर्द को बयां किया। दुनिया ने उसे भरोसा दिया कि तुम अकेली नहीं हो। पूरा भारत का स्वाभिमानी देशभक्त तुमलोगों के पीछे खड़ा है।

भारत सरकार से आग्रह है कि रंगीन दुनिया के काले कारनामें से देशवासियों को अवगत कराएं एवं विदेश में बैठकर अलकायदा, टुकड़े-टुकड़े गैंग, भारत से आजादी चाहने वाले संगठन से कठोरता से निपटे। सरकार इसपर ध्यान दे कि क्या भारत में कमाया धन भारत के टुकड़े करने वालों को जाना चाहिए या भारत के उन गरीबों, बेरोजगारों को मिलना चाहिए? भारत सरकार ऐसे संगठनों का भंडाफोड़ कर सशक्त कार्रवाई करे एवं स्वाभिमानी देशभक्तों, कलाकारों को निर्भिक होकर काम करने का मौका मिले। यहीं सुशांत सिंह राजपूत को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

✍ प्रो. रामावतार सिंह
       एक्स प्रिंसिपल
       KSS College Lakhisarai, Bihar.


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